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هوامش العدد :
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[1] - هذه البحوث الفقهية وفقاً للمذاهب الإسلامية يقوم بتحريرها فضيلة الشيخ محمد مهدي نجف من علماء الحوزة العلمية بقم المقدسة.

[2] - الانتصار / 169، والخلاف 1/ 651، وعمدة القاري 6 / 273، والمغني 2/ 223، وفتح العزيز بهامش المجموع 5/ 4، المجموع 5/ 2 - 3، والنتف 1/ 98، والمبسوط 2/ 37، وكفاية الأخيار 1/ 95 ومغني المحتاج 1/ 310.

[3] - المجموع 5/ 3، ومغني المحتاج 1 / 310، وفتح العزيز 5/ 4.

[4] - عمدة القاري 6 / 273، والمغني 2/ 223، وفتح العزيز بهامش المجموع 5/ 4، المجموع 5/ 2 - 3، والنتف 1/ 98، والمبسوط 2/ 37، وكفاية الأخيار 1/ 95 ومغني المحتاج 1/ 310.

[5] - التهذيب 3/ 127 الحديث 269 والاستبصار 1/ 443 الحديث 1710.

[6] - التهذيب 3/ 127 الحديث 270 والاستبصار 1/ 443 الحديث 1711.

[7] - الخلاف 1/ 664، والمبسوط للسرخسي 2/ 37، وشرح فتح القدير 2/ 39، وبداية المجتهد 1/ 210.

[8] - الأم 1/ 240، والمجموع 5/ 26، وبداية المجتهد 1/ 210.

[9] - الخلاف 1/ 656، والأم 1/ 235 و248، والأصل 1/ 372، ومختصر المزني/ 31، والمجموع 5/ 13، والمبسوط 2/ 38.

[10] - الأم 1/ 235، وفي المجموع 5/ 14، عن الزهري، وهو من أصحاب سعيد ابن المسيب والراوين عنه.

[11] - المحلى 5/ 85.

[12] - قال النووي في المجموع 5/ 14، قال ابن المنذر/ وروينا عن الزبير أنه أذن لها وأقام.

[13] - صحيح مسلم 2/ 602 الحديث 884.

[14] - سنن الترمذي 2/ 412 حديث 532 باب (384).

[15] - سنن النسائي 3/ 182، وسنن الدار قطني 2/ 47 الحديث السادس عشر.

[16] - الخلاف 1 / 658.

[17] - المصدر السابق.

[18] - الأم 1/ 236، والمجموع 5/ 15، وفتح العزيز 5/ 46، وسنن الترمذي 2/ 416، وبداية المجتهد 1/ 213.

[19] - المدونة الكبرى 1/ 169، وبداية المجتهد 1/ 213، والاقناع 1/ 201، وسنن الترمذي 2/ 416 - 417، والأم 1/ 236، والمحلى 5/ 83، والمجموع 5/ 19.

[20] - الأم 1/ 236، وفتح العزيز 5/ 46، والمحلى 5/ 83.

[21] - المحلى 5/ 83، والمجموع 5/ 20.

[22] - الهداية 1/ 86، واللباب 1/ 117، وشرح فتح القدير 1/ 425، والمجموع 5/ 20، وفتح العزيز 5/46.

[23] - سنن أبي داود 1/ 299 حديث 1151.

[24] - سنن الترمذي 2/ 24 حديث 534، وسنن ابن ماجة 1/ 407 حديث 1279.

[25] - الكافي 3/ 460 الحديث الخامس، والتهذيب 3/ 130 حديث 279، والاستبصار 1/ 448 حديث 1734.

[26] - من لا يحضره الفقيه 1/ 324 حديث 1485، والتهذيب 3/ 130 حديث 280، والاستبصار 1/ 447 حديث 1728.

[27] - الخلاف 1/ 660، والأم 1/ 237، والمجموع 5/ 21، وفتح العزيز5/ 51.

[28] - الأصل 1/ 374، والنتف 1/ 100، والمبسوط 2/ 39، والمحلى 5/ 83. والمجموع 5/ 21، وفتح العزيز 5/ 51.

[29] - المدونة الكبرى 1/ 169، والمجموع 5/ 21، وفتح العزيز 5/ 51.

[30] - السنن الكبرى للبيهقي 3/ 293.

[31] - التهذيب 3/ 288 حديث 866 بزيادة ونقصان.

[32] - الخلاف 1/ 661، والأم 1/ 236، والمجموع 5/ 17، وفتح العزيز5/ 49.

[33] - بلغة السالك 1/ 187، والمجموع 5/ 21.

[34] - اللباب 1/ 118، والمبسوط 2/ 39، والمجموع 5/ 20.

[35] - الكافي 3/ 460 الحديث الخامس، والتهذيب 3/ 130 حديث 279، والاستبصار 1/ 448 حدث 1734.

[36] - الخلاف 1/ 663، والأم 1/ 235، والأصل 1/ 371، واللباب 1/ 118، والمجموع 5/ 21، والمبسوط 2/ 37، ومختصر المزني/31، وفتح العزيز 5/ 54.

[37] - المبسوط 2/ 37، وقال ابن حزم في المحلّى (5/ 85 ) / وممّا أحدث بنو أمية من تأخير الصلاة وإحداث الأذان والإقامة، وتقديم الخطبة قبل الصلاة.

[38] - صحيح مسلم 1/ 69 الحديث 78، وسنن ابن ماجة 2/ 133، الحديث 4013، وسنن أبي داود 1/ 296 الحديث 1140، ومسند أحمد بن حنبل 3/ 20.

[39] - المغني 2/ 247، والمبسوط 2/ 43، واللباب 1/ 120، والمحلى 5/ 91، والمجموع 5/ 40، وفتح العزيز 5/ 11.

[40] - الأم 1/ 241، والوجيز 1/ 69، والمجموع 5/ 31 و 39، وفتح العزيز 5/ 11 و 12، وبداية المجتهد 1/ 209، وبلغة السالك 1/ 189، والمبسوط 2/ 43، والمغني 2/ 247.

[41] - الخلاف 1/ 673، المجموع 4/ 492، وبداية المجتهد 1/ 211، والمغني 2/ 212.

[42] - الأم 1/ 239، وبداية المجتهد 1/ 211، والمجموع 4/ 492، والمغني 2/ 212.

[43] - سنن أبي داود 1/ 281 حديث 1073 باختلاف في الألفاظ.

[44] - سنن ابن ماجة 1/ 416 حديث 1312.

[45] - التهذيب 3/ 137 حديث 304.

[46] - الكافي 3/ 461 الحديث الثامن، والتهذيب 3/ 137 حديث 306.

[47] - سنن أبي داود 1/ 281 حديث 1070، وسنن النسائي 3/ 194، وسنن الدارمي 1/ 378، ومسند أحمد 4/ 372.

[48] - الخلاف 1/ 644، والأم 1/ 222، والمجموع 4/ 425، وكفاية الأخيار 1/ 99 والمغني 2/ 268، والوجيز 1/ 68، ومغني المحتاج 1/ 304.

[49] - المبسوط 2/ 48، اللباب 1/ 126، والمجموع 4/ 433، والمغني 2/ 268.

[50] - البقرة 238 - 239.

[51] - في الكافي والتهذيب/ ليلة صفين وهي.....

[52] - التهذيب 3/ 173 الحديث 384، والكافي 3/ 457 الحديث 2.

[53] - الفقيه 1/ 296 الحديث 1349، والتهذيب 3/ 174 الحديث 386.

[54] - الخلاف 1/ 646 ، والأم 1/ 218، والمجموع 4/ 431.

[55] - المجموع 4/ 432، والاصل 1/ 403، والمبسوط 2/ 49.

[56] - سورة البقرة / 239.

[57] - الخلاف 1/ 647، الأُم 1/ 218، والمجموع 4/ 432، وفتح العزيز 4/ 651.

[58] - المجموع 4/ 432، وفتح العزيز 4/ 651.

[59] - فتح العزيز 4/ 652.

[60] - الخلاف 1/ 639، والأم 1/ 210، ومختصر المزني/ 28، والاقناع 1/ 187، والمجموع 4/ 408، والمغني 2/ 254.

[61] - المبسوط 2/ 47، المغني 2/ 254، وفتح العزيز 4/ 633.

[62] - المبسوط 2/ 46.

[63] - الأصل 1/ 390، والهداية 1/ 89، والمبسوط 2/ 46 والمغني 2/ 254، وفتح العزيز 4/ 633.

[64] - موطأ مالك 1/ 183 الحديث الأول، صحيح البخاري 5/ 145، وصحيح مسلم 1/ 575 الحديث 310، سنن النسائي 3/ 171، سنن أبي داود 2/ 13 الحديث 1238، مسند أحمد بن حنبل 5/ 370.

[65] - الكافي 3/ 455 الحديث 1، والتهذيب 3/ 171 الحديث 379، والاستبصار 1/ 455 الحديث 1766.

[66] - الخلاف 1/ 682، والسنن الكبرى للبيهقي 3/ 343، وسبل السلام 2/ 512.

[67] - الكافي 3/ 464 الحديث 3، والفقيه 1/ 346 و529، والتهذيب 3/ 155 الحديث 330.

[68] - التهذيب 3 / 155.

[69] - الخلاف 1/ 677.

[70] - المغني 2/ 280، والمبسوط للسرخسي 2/ 75، والمجموع 5/ 43 - 44، فتح العزيز 5/ 69، كفاية الأخيار 1/ 96، الوجيز 1/ 71، وشرح فتح القدير 1/ 432، وبداية المجتهد 1/ 203.

[71] - صحيح مسلم 2/ 618 - 620 الحديث 1 و 3 و 6، وسنن النسائي 3/ 130 - 132، وسنن ابن ماجة 1/ 401 الحديث 1263، باختلاف يسير في ألفاظها.

[72] - صحيح مسلم 623 2 الحديث 10.

[73] - التهذيب 3/ 155 الحديث 331، التهذيب 3/ 127 الحديث 269، الكافي 3/ 464 الحديث 4، ومن لا يحضره الفقيه 1/ 320 الحديث 1457، والتهذيب 3/ 290 الحديث 875، والاستبصار 1/ 443 الحديث 1711.

[74] - الخلاف 1/ 677، الأم 1/ 243، وفتح العزيز 5/ 69، وبداية المجتهد 1/ 205.

[75] - فتح العزيز 5/ 69، وبداية المجتهد 1/ 205.

[76] - التهذيب 3/ 155 الحديث 331.

[77] - الخلاف 1/ 679.

[78] - الأم 1/ 245، والمجموع 5/ 45، و 62، وفتح العزيز 5/ 69 و 73، والمبسوط 2/ 74 وسنن الترمذي 2/ 448، و 450، والمغني 5/ 275، وبداية المجتهد 1/ 203.

[79] - المبسوط 2/ 74، والهداية 1 / 88، والمجموع 5/ 62، وبداية المجتهد 1/ 203، والمغني 2/ 276.

[80] - التهذيب 3/ 156 الحديث 335، والكافي 3/ 463 الحديث 2.

[81] - الخلاف 1/ 681، وسنن الترمذي 2/ 448 و 453، والمبسوط 2/ 76، واللباب 1/ 121، والهداية 1/ 88، والمغني 2/ 276 والمجموع 5/ 52، وبداية المجتهد 1/ 204، وفتح العزيز 5/ 76.

[82] - المبسوط 2/ 76، الهداية 1/ 88، واللباب 1/ 121 والأم 1/ 244، والمجموع 5/ 46 و 52، والوجيز 1/ 71 وفتح العزيز 5/ 76، وبداية المجتهد 1/ 204، والمغني 2/ 275 والمحلى 5/ 101، وسنن الترمذي 2/ 448 و 452.

[83] - المبسوط 2/ 76 والمجموع 5/ 52، والمغني 2/ 276.

[84] - اللباب 1/ 121، المجموع 5/ 53، والمغني 2/ 278، وفتح العزيز 5/ 75.

[85] - الأم 1/ 245، والمغني 2/ 278، والمجموع 5/ 52، وفتح العزيز 5/ 75، وبداية المجتهد 1/ 205، والوجيز 1/ 71.

[86] - الخلاف 1/ 682، والأُم 1/ 242 و246، والمجموع 5/ 44، والمغني 2/ 274، وبداية المجتهد 1/ 206.

[87] - المغني 2/ 273، وفتح العزيز 5/ 75.

[88] - اللباب 1/ 121، والهداية 1/ 88، والمجموع 5/ 44، وفتح العزيز 5/ 75، والمغني 2/ 273.

[89] - صحيح مسلم 2/ 628 الحديث 21.

[90] - التهذيب 3/ 293 الحديث 887.

([91]) ستأتي الإشارة إلى مصادر هذه المسألة عمّا قريب، فانتظر.

([92]) الانتصار: ص281 .

([93]) راجع: تهذيب اللغة: ج6 ص47 ـ 49، صحاح اللغة: ج2 ص494، المصباح المنير: ص 324 ـ 325، لسان العرب: ج2 ص2108 ـ 2109، القاموس المحيط: 316 ـ 317، تاج العروس: ج8 ص252 ومابعدها.

وللاطّلاع على موارد استعمال «الشهادة» في الآيات الكريمة راجع المصادر المتقدّمة، مضافاً إلى: التبيان: ج5 ص281، مفردات الراغب: ص465 ـ 466، تفسير الفخر الرازي: ج5 ص88.

([94]) المسالك: ج14 ص153.

([95]) لاحظ: مستند الشيعة: ج18 ص9 ـ 10، الرسائل الرجالية: ج1 ص279 ـ 281 و360 ـ 363.

([96]) الجواهر: ج40 ص107 وج41 ص7 ـ 8 .

([97]) المبدع: ج8 ص281، مواهب الجليل: ج6 ص151، مغني المحتاج: ج4 ص426، مجمع الأنهر: ج2 ص185.

([98]) المحلّى: ج9 ص48، المجموع: ج16 ص175 و199.

([99]) المغني: ج7 ص339، المجموع: ج16 ص175 و199.

([100]) لاحظ المصدرين المتقدّمين.

([101]) المغني: ج7 ص339.

([102]) المغني: ج7 ص339.

([103]) المصدر السابق: ج7 ص340.

([104]) المصدر السابق .

([105]) كشّاف القناع: ج5 ص65.

([106]) مواهب الجليل: ج3 ص408 ـ 410، حاشية الدسوقي على الشرح الكبير: ج3 ص6 ـ 7، جواهر الإكليل: ج1 ص275.

ونهي النبيّ(صلى الله عليه وآله) عن نكاح السرّ تجده في مجمع الزوائد: ج4 ص288 ـ 289.

ويذهب الدكتور وهبة الزحيلي إلى أنّ رأي المالكية المعتمد هو وجوب الإشهاد، بخلاف ما تنقله بعض المصادر القديمة والحديثة من استحبابه. لاحظ الفقه الإسلامي وأدلّته: ج7 ص70 (الهامش الثاني).

([107]) الاستذكار: ج5 ص471، المجموع: ج16 ص199.

([108]) بداية المجتهد: ج2 ص17 ـ 18، الميزان الكبرى الشعرانية: ج2 ص155.

([109]) الاستذكار: ج5 ص470.

([110]) المغني: ج7 ص435.

([111]) الاستذكار: ج5 ص470، الجامع لأحكام القرآن: ج3 ص79، فقه السنّة: ج2 ص53.

([112]) تحفة الفقهاء: ص281، النتف في الفتاوى: ج1 ص279، المبسوط للسرخسي: ج5 ص11 و16 و30 ـ 31 و35، عمدة الفقه: ص88، الإقناع في حلّ ألفاظ أبي شجاع: ج2 ص71، مغني المحتاج: ج3 ص144، منار السبيل: ج2 ص157.

([113]) المغني: ج7 ص339، المجموع: ج16 ص175 و199.

([114]) انظر المصدرين السابقين بالإضافة إلى الاستذكار: ج5 ص471.

([115]) المبسوط للسرخسي: ج5 ص11.

([116]) المصنّف لابن أبي شيبة: ج3 ص277، سنن الترمذي: ج3 ص411، المعجم الكبير للطبراني: ج12 ص141، السنن الكبرى للبيهقي: ج7 ص125 ـ 126، كنز العمّال: ج2 ص9.

([117]) المصنّف للصنعاني: ج6 ص196، المعجم الكبير للطبراني: ج18 ص118، مجمع الزوائد: ج4 ص286 ـ 287.

([118]) معرفة علوم الحديث: ص134، السنن الكبرى للبيهقي: ج7 ص125، تاريخ مدينة دمشق: ج14 ص272.

([119]) الموطّأ: ج2 ص535، السنن الكبرى للبيهقي: ج7 ص126، كنز العمّال: ج16 ص533.

([120]) سنن الدارقطني: ج3 ص225.

([121]) المصنّف للصنعاني: ج7 ص273، السنن الكبرى للبيهقي: ج7 ص142.

([122]) مسند أحمد: ج6 ص58، المنتقى لابن الجارود: ص143.

([123]) الاستذكار: ج5 ص471 ـ 472.

([124]) خلاصة الإيجاز: ص38 ـ 39.

([125]) الطبقات الكبرى لابن سعد: ج7 ص483، التاريخ الكبير: ج5 ص212، كتاب الضعفاء والمتروكين للنسائي: ص148، كتاب الضعفاء للعقيلي: ج2 ص309 ـ 310، الجرح والتعديل: ج5 ص176، الكامل لابن عدي: ج4 ص132 ـ 135.

([126]) نيل الأوطار: ج6 ص259، تحفة الأحوذي: ج4 ص235.

([127]) راجع المجموع: ج16 ص174.

([128]) خلاصة الإيجاز: ص38 ـ 39.

([129]) الخلاف: ج4 ص263.

([130]) المغني: ج7 ص338، نصب الراية: ج3 ص185، تحفة الأحوذي: ج4 ص228 ـ 229 و231 ـ 232.

قال الزيلعي: «ذكر عن يحيى بن معين أنّه قال: لم يذكر هذا عن الزهري إلاّ إسماعيل بن عليّة عن ابن جريج، وضعّف يحيى رواية إسماعيل عن ابن جريج... وليس هذا ممّا يقدح في صحّة الخبر; لأنّ الضابط من أهل العلم قد يحدّث بالحديث ثمّ ينساه، فإذا سُئل عنه لم يعرفه، فلا يكون نسيانه دالاًّ على بطلان الخبر». (نصب الراية: ج3 ص185).

([131]) سورة البقرة: الآية 232.

([132]) سورة البقرة: الآية 230.

([133]) المصنّف للصنعاني: ج6 ص145، سنن أبي داود: ج2 ص233، سنن النسائي: ج6 ص85، السنن الكبرى للبيهقي: ج7 ص118، كنز العمّال: ج16 ص311.

([134]) حيث لو أجمعوا على قولين فلا يجوز إحداث قول ثالث في المسألة. لاحظ الخلاف: ج3 ص109.

ولا يخفى أنّ هذا أمر مُختلفٌ فيه. راجع: مبادئ الوصول: ص191، معالم الدين: ص177. وانظر كذلك: اللمع للشيرازي: 262، المحصول للفخر الرازي: ج4 ص140 و143، الإحكام للآمدي: ج1 ص268 وما بعدها.

([135]) المصنّف للصنعاني: ج1 ص497، سنن الدارقطني: ج1 ص420، المستدرك للحاكم: ج1 ص373، عوالي اللئالي: ج1 ص306.

([136]) الاختصاص: ص219، وسائل الشيعة: ج9 ص380 و384 و412.

([137]) كشف الرموز: ج2 ص100 ـ 101، المهذّب البارع: ج3 ص200 ـ 202.

وراجع: خلاصة الإيجاز: 39، الانتصار: 283، رسائل الشريف المرتضى: ج1 ص236 ـ 237، الخلاف: ج4 ص263، التنقيح الرائع: ج3 ص13.

ولمسألة دخول أدوات النفي على الكلام، وهل أنّها تفيد نفي الأصل أو نفي الكمال، فيمكن أن تلاحظ: الفصول في الأُصول: ج1 ص351، اللمع للشيرازي: ص149، أُصول السرخسي: ج1 ص90، الفصول الغروية: ص224، تعليقة القزويني على المعالم: ج2 ص370.

([138]) الانتصار: ص283.

([139]) انظر المصدر السابق: ج16 ص174.

([140]) السنن الكبرى للبيهقي: ج7 ص125، تهذيب الكمال: ج24 ص351، تهذيب التهذيب: ج9 ص21.

([141]) التنقيح الرائع: ج3 ص12. والرواية تجدها في: الموطّأ: ج2 ص524، مسند أحمد: ج1 ص219 و242، سنن الدارمي: ج2 ص138، سنن النسائي: ج6 ص84، السنن الكبرى للبيهقي: ج7 ص115 و118 و122، كنز العمّال: ج16 ص310.

والأيّم: من لا زوج لها، بكراً كانت أو ثيِّباً، مطلّقة أو متوفّى عنها زوجها. (لسان العرب: ج1 ص206). وهنا أتت الكلمة بمعنى الثيِّب.

([142]) معرفة السنن والآثار: ج5 ص254، إرواء الغليل: ج6 ص261.

([143]) الاستذكار: ج5 ص469.

([144]) التذكرة: ج2 ص571.

([145]) المجموع: ج16 ص174، نيل الأوطار: ج6 ص259، وراجع ميزان الاعتدال: ج4 ص242.

([146]) تنقيح التحقيق: ج2 ص169.

([147]) المجموع: ج16 ص175، ولاحظ التاريخ الكبير: ج7 ص319.

([148]) نُسب هذا البيت الشعري للصلتان العبدي في: شرح شافية ابن الحاجب للإسترآبادي: ج4 ص185، خزانة الأدب 2: 160 ـ 161.

([149]) ورد الحديث بألفاظ متفاوتة في: سنن ابن ماجة: ج1 ص611، سنن الترمذي: ج3 ص399، السنن الكبرى للبيهقي: ج7 ص290. وورد كذلك بأسانيد متعدّدة، ولكن جميعها مدخولة. راجع: العلل المتناهية: ج2 ص627 ـ 628، مصباح الزجاجة: ج2 ص87، تلخيص الحبير: ج4 ص201، الدراية لابن حجر: ج2 ص55.

([150]) بدائع الصنائع: ج3 ص394.

([151]) المغني: ج7 ص340، كشّاف القناع: ج5 ص65.

([152]) انظر المصدرين السابقين.

([153]) نيل الأوطار: ج6 ص260.

([154]) البحر الزخّار: ج4 ص27.

([155]) أُصول الأحكام: ج1 ص87 .

([156]) المهذّب في فتاوى الإمام المنصور بالله: ص145، الاعتصام بحبل الله المتين: ج3 ص193 ـ 196، شرح الأزهار: ج4 ص548 ـ 549.

([157]) مختصر البسيوي: ص191، مكنون الخزائن: ج6 ص35.

([158]) نُسب للمشهور في: المختلف: ج7 ص118، كفاية الفقه: ج2 ص80، كتاب النكاح للأنصاري: ص32.

([159]) رياض المسائل: ج11 ص19.

([160]) الانتصار: ص281 ـ 282، الناصريات: ص319 و324، الخلاف: ج4 ص261 ـ 262، السرائر: ج2 ص550، التذكرة: ج2 ص571، التنقيح الرائع: ج3 ص12، المسالك: ج7 ص100. ولاحظ: المقنعة: ص497، النهاية: ص450.

([161]) الجواهر: ج29 ص39.

([162]) حُكي عنه في: المختلف: ج7 ص118، وكشف اللثام: ج7 ص54، ورياض المسائل: ج11 ص20، وغيرها.

([163]) تقدّمت مصادر الإجماع، فراجع. وذكر النجفي في «الجواهر: ج29 ص40»: أنّ المعروف بين فقهاء الإمامية عدم وجوب الإشهاد، بل القول بالوجوب شاذّ.

([164]) المختلف: ج7 ص118.

([165]) فقه الإمام جعفر الصادق(عليه السلام) : ج5 ص182.

([166]) المختلف: ج7 ص118.

([167]) سورة النساء: الآية 3.

([168]) سورة النور: الآية 32.

([169]) رسائل الشريف المرتضى: ج1 ص236، الخلاف: ج4 ص263.

وقد يُقال: إنّ الآيتين في مقام بيان أصل النكاح واستحبابه، لا جزئياته.

([170]) المهذّب البارع: ج3 ص201.

([171]) التذكرة: ج2 ص571.

([172]) رياض المسائل: ج11 ص20.

([173]) وسائل الشيعة: ج20 ص98.

([174]) المصدر السابق: ج20 ص99 ـ 100.

([175]) وسائل الشيعة: ج2 ص98.

([176]) رياض المسائل: ج11 ص20. ولاحظ: الناصريات: ص319، جامع المقاصد: ج12 ص13.

([177]) الموطّأ: ج2 ص526، مسند أحمد: ج5 ص336، سنن ابن ماجة: ج1 ص608، سنن أبي داود: ج2 ص236، سنن الترمذي: ج3 ص421 ـ 422.

([178]) الخلاف: ج4 ص262.

([179]) المغني: ج7 ص340.

([180]) المصدر السابق: ج7 ص340.

([181]) التذكرة: ج2 ص571.

([182]) المبسوط للسرخسي: ج5 ص59، بدائع الصنائع: ج5 ص111 ـ 112.

([183]) سورة النور: الآية 32.

([184]) الانتصار: ص282.

([185]) كتاب النكاح للأنصاري: ص33.

([186]) التهذيب: ج7 ص255، الاستبصار: ج3 ص146.

([187]) التهذيب: ج7 ص255، رياض المسائل: ج11 ص20.

([188]) المختلف: ج7 ص119، التنقيح الرائع: ج3 ص12.

([189]) التنقيح الرائع: ج3 ص12، رياض المسائل: ج11 ص20.

([190]) المختلف: ج7 ص119. ولاحظ توضيح المقال: ص259 و265 و276.

([191]) مقباس الهداية: ج1 ص283.

([192]) المختلف: ج7 ص119.

([193]) جامع المقاصد: ج12 ص14.

([194]) المختلف: ج7 ص119.

([195]) المسالك: ج7 ص100.

([196]) سورة الأحزاب: الآية 50.

([197]) حُكي عنه في: الكشف والبيان: ج4 ص54، وزاد المسير: ج6 ص209، وغيرهما.

([198]) التبيان: ج8 ص319 ـ 320.

([199]) كتاب النكاح للأنصاري: ص33.

([200]) نهاية المرام: ج1 ص41.

([201]) المقصود بالأحوال الشخصية: الأوضاع التي تكون بين الإنسان وأُسرته، وما يترتّب عليها من آثار حقوقية والتزامات أدبية ومادّية. وهذا اصطلاح حقوقي حديث أُطلق في مقابل الأحوال المدنية، وأوّل من أطلقه الحقوقي الفقيه محمّد قدري باشا. (شرح مدوّنة الأحوال الشخصية السورية: ج1 ص8).

([202]) مجموعة الأحوال الشخصية في ضوء الفقه والقضاء: ص20 .

([203]) الأحوال الشخصية فقهاً وقضاءً: ص41.

([204]) الزواج وبيان أحكامه في الشريعة الإسلامية: ص50 ـ 51.

([205]) الفقه الإسلامي وأدلّته: ج7 ص78 .

([206]) الفقه المقارن للأحوال الشخصية: ص61 ـ 62.

([207]) شرح أحكام الأحوال الشخصية: ص134.

([208]) شرح مدوّنة الأحوال الشخصية المغربية: ج1 ص45 ـ 46.

([209]) أحكام الأُسرة في الإسلام: ص104 ـ 109 .

([210]) الأحوال الشخصية لأبي زهرة: ص52 ـ 54 و57.

([211]) الأحوال الشخصية في الشريعة الإسلامية: ص24.

([212]) التقريب (شرح مدوّنة الأحوال الشخصية): ص123 ـ 125.

([213]) المرجع الوافي في قضاء الأحوال الشخصية: ص139 ـ 141.

([214]) موسوعة الفقه والقضاء في الأحوال الشخصية : ص101 ـ 103.

([215]) الوجيز في الأحوال الشخصية: ص63 ـ 64.

([216]) الموسوعة الشاملة في الأحوال الشخصية: ج1 ص39 ـ 41.

([217]) حقوق مدنى (خانواده) «القانون المدني.. العائلة»: ج1 ص59 ـ 60 (الهامش الثاني).

[218] - الحداثة ومابعد الحداثة ص 195.

[219] - الفتاوى الواضحة 753.

[220] - الحداثة وما بعد الحداثة ص 201.

[221] - الوسائل، ج 1، ص 96.

[222] - الوسائل، ج 11، ص 17.

[223] - منهج التربية الاسلامية، ص 157.

[224] - الاحزاب/ 33.

[225] - ابراهيم/ 65.

[226] - الأحزاب/ 39.

[227] - حجرات/ 12.

[228] - النور/ 19.

[229] - البقرة/ 75.

[230] - النساء/ 46.

[231] - البقرة/ 79.

[232] - الإسراء/ 36.

[233] - الحجرات/ 6.

[234] - القصص/ 55.

[235] - النمل/ 81.

* - المصري اليوم بتأريخ 25/9/2008.

* - نقلا عن جريدة الدستور اليومية بتأريخ 27/9/2008.

[238] - عن الدستور المصرية في 23/9/2009.

* - نقلا عن جريدة (المصري اليوم) في 25/9/2008.

* - نقلاً عن العرب تايمز بتاريخ 5/10/2008.

[241]- عبدالرحمن الكواكبي لسيد زغلول .

[242]- عبدالرحمن الكواكبي لسعد زغلول : 37 ـ 38 .

[243]- هذا البيت للمتنبّي، لاحظ ديوانه 4 : 64. إلاّ أنّه ورد : (الأجسام) بدل (الأجساد).

[244]- عبدالرحمن الكواكبي لسعد زغلول : 115 .

[245]- زعماء الإصلاح في العصر الحديث : 267 .

[246]- زعماء الإصلاح في العصر الحديث : 267 .

[247]- أُمّ القرى (ضمن المجموعة الكاملة للكواكبي بدراسة د . عمارة) : 127 .

[248]- عبدالرحمن الكواكبي لسعد زغلول : 120 .

[249]- لاحظ عبدالرحمن الكواكبي لسعد زغلول : 120 ـ 121 .

[250]- الأدب العربي المعاصر في سورية : 121 .

[251]- الاستبداد وبدائله في فكر الكواكبي : 532.

[252]- عبدالرحمن الكواكبي (ضمن المجموعة الكاملة للعقّاد) 17 : 260 .

[253]- عبدالرحمن الكواكبي وفلسفة الاستبداد : 128 .

[254]- علاقات الاستبداد في فكر الكواكبي : 287.

[255]- مقالة : « نظرية الوحدة الإسلامية في آراء المصلحين في التاريخ المعاصر » للدكتور جلال درخشة، مجلّة « رسالة التقريب »، العدد: 54، بتاريخ : ربيع الأوّل وربيع الثاني / 1427 هـ، صفحة : 84 ـ 85 .

[256]- أُمّ القرى (ضمن المجموعة الكاملة للكواكبي بدراسة د . عمارة) : 152 .

[257]- المصدر السابق : 214 .

[258]- المصدر السابق : 243 ـ 246، والآية من سورة الشورى 42 : 13 .

[259]- أُمّ القرى (ضمن المجموعة الكاملة للكواكبي بدراسة د . عمارة ) : 277 .

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